BluSparrow https://blog.blusparrow.in BLOG Fri, 07 Jan 2022 10:33:11 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.0 https://i0.wp.com/blog.blusparrow.in/wp-content/uploads/2021/12/cropped-BluSparrow_profile-icon-06.png?fit=32%2C32&ssl=1 BluSparrow https://blog.blusparrow.in 32 32 214496122 रफ़ीज़ा https://blog.blusparrow.in/rafeeza/ https://blog.blusparrow.in/rafeeza/#respond Fri, 31 Dec 2021 10:33:18 +0000 https://blog.blusparrow.in/?p=31

सर्दियों का मौसम था.. सुबह के नौ बज रहे थे.. रात की नींद काफ़ी देर से हुई थी.. इसलिए आँखें खुलने का नाम नहीं ले रही थीं.. संध्या सुमित को कब से आवाज़ लगाये जा रही थी पर सुमित है कि बिस्तर छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था… दो मिनट.. दो मिनट कहकर सुमित ने और आधे घण्टे बिस्तर में गुज़ार दिए.. आख़िरकार रसोई से ज़ोर से आवाज़ लगाई संध्या ने.. तुम उठते हो कि नहीं अब.. तुम्हें बैंक भी जाना है.. चेक भी डिपॉजिट करना है.. फिर वहाँ से लौटते वक़्त त्रिभुवन डेरी से पनीर भी लाना है.. पता नहीं कब उठोगे.. कब तैयार होगे और ना जाने कब जाओगे.. इस लॉक डाउन में तो तुम बहुत ही आलसी हो गए हो.. बताओ.. दस बजने को है.. अभी तक बदन पर पानी भी नहीं पड़ा..!

इतना सब सुनने के बाद सुमित उठकर बैठ गया.. थोड़ी देर बैठने के बाद सरकते हुए जैसे ही उसने चारपाई से अपने कदम ज़मीन पर रखे और खड़े होने लगा.. एक ज़ोर की कराह उसके मुँह से निकली..” आह..ह..ह…” ऑंखों के सामने घना अँधेरा छा गया और वो वहीं चारपाई पर बैठ गया.. सुमित का बायाँ पाँव सीधा होने का नाम ही नहीं ले रहे था.. घुटने के ऊपर थोड़ी सूजन भी हो गई थी.. रसोई से संध्या दौड़ती हुई आई.. और सुमित पर चिल्लाने लगी.. और नाचो.. मना किया था ना.. गुड्डू की शादी में मत नाचना.. कल रात खूब उछल उछल कर नाच रहे थे.. जब इंसान को पता हो कि हमें फलाँ चीज़ से तक़लीफ़ है तो वह काम नहीं करना चाहिए.. पर नहीं.. हमें तो नाचना है.. तो नाचो.. वैसे भी तुम मेरी सुनते ही कहाँ हो..

सुमित ने दर्द में मुस्कुराते हुए कहा.. हाँ.. हाँ.. सत्रह साल से तो कोई और ही सुन रहा है ना.. ख़ैर.. अभी वो सब छोड़ो और इस दर्द का कुछ करो मैं सहन नहीं कर पा रहा हूँ.. संध्या सुमित के पैर पकड़ कर धीरे-धीरे सीधा करने की कोशिश करने लगी पर सुमित का दर्द देखकर रूक गई.. तभी सुमित ने संध्या से कहा.. सुनो.. एक काम करो.. थोड़ा नमक तवे पर गर्म करो और सूती कपड़े में बाँध कर दो.. थोड़ा सेंकता हूँ.. शायद कुछ फ़र्क़ पड़े.. इतना सुनते ही संध्या रसोई में चली गई।

सुमित और संध्या.. दोनों ने प्रेम विवाह किया था.. एक दूसरे से जितना तू-तू मैं-मैं था.. उससे कहीं ज़्यादा दोनों में प्रेम था.. और ये बात.. दोनों ही अच्छी तरह जानते थे.. अगर किसी के दाम्पत्य जीवन में प्रेम ढूँढ़ना है तो उनकी तू-तू मैं-मैं ज़रूर सुनें.. उनकी बातों में सच्चे प्रेम की झलक अवश्य दिखाई देगी..

सुमित.. था तो मनमौजी पर भीतर से उतना ही संवेदनशील.. पर कभी जताया नहीं किसी को.. बहुत लोगों से दोस्ती थी उसकी.. रोज़ काम के बाद कहीं किसी से मिलना आदत थी उसकी.. लोगों के साथ मिलना जुलना.. नाचना गाना.. हँसी मज़ाक पसन्द था उसे.. तकरीबन चौदह साल पहले की बात है.. एक दिन सुमित किसी दोस्त के घर सीढ़ियों से फ़िसल कर गिर गया था.. पैर के बायें घुटने के निचले हिस्से पर काफ़ी गहरी और अंदरूनी चोट लगी.. पर उसने नज़रन्दाज़ कर दिया.. घर आकर भी बताया नहीं किसी को.. कुछ महीने बीते.. इस दरम्यान कभी कभी थोड़ा दर्द उठता तो मलहम लगाकर मालिश कर लेता.. करीबन छह महीने बाद अचानक दर्द काफ़ी बढ़ गया.. डॉक्टर के पास ले जाया गया.. एक्स-रे.. एम आर आई.. सब कुछ निकालने के बाद पता चला.. उस चोट ने गाँठ का रूप ले लिया है.. ऑपेरशन कर निकालना होगा.. उस वक़्त ये सब देखकर संध्या बहुत परेशान हुई और सुमित से कहा वक़्त रहते ही अगर इलाज़ कर लिया होता तो ये चोट आज गाँठ में तब्दील ना होती पर सुमीत उस वक़्त भी शायराना अंदाज़ में संध्या से कहता है.. “इस चोट की गाँठ तो निकल जायेगी.. पर उनका क्या जो बातों से लगी हैं…”

ऑपरेशन हुआ.. करीबन एक महीने तक बिस्तर पर रहने के बाद थोड़ा थोड़ा चलना शुरू किया सुमित ने.. और फिर धीरे धीरे ठीक हो गया.. पर डॉक्टर ने हिदायत दी थी अब हमेशा थोड़ा सम्भालना होगा.. चौदह साल हो गये इस बात को.. पर सुमित वैसा का वैसा ही.. कुछ नहीं बदला सिवाय उम्र के.. ख़ैर

संध्या गर्म नमक कपड़े में बाँध लाई और सुमित के पाँव को सेंकने लगी.. सुमित के चेहरे पर थोड़ी राहत साफ झलक रही थी.. सुमित को एहसास होने लगा सुख का और उसने अपनी आँखें मूँद लीं..

आप जब बस में सफ़र कर रहें हों.. और खिड़की से आती हवा आपके चेहरे को चूम रही हो.. तब आप धीरे धीरे नींद की आगोश में समा जाते हैं.. एक अलग ही सुकून मिलता है.. ठीक उसी वक़्त गतिरोधक आने पर अगर बस का ड्राइवर अचानक से ब्रेक लगा दे तब आपकी सुख भरी नींद टूट जाती है.. तब आप मन ही मन उसे कोसने लगते हैं.. पर कुछ ही देर बाद आप दोबारा कोशिश करते हैं.. और आपकी आँखें फिर बन्द होने लगती हैं.. और आप पा जाते हैं उस खोये हुए सुख को दोबारा..
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जीवन भी बस में यात्रा करने जैसा ही है.. सुख की हवा जब खिड़की से आती है तब हम आँखें मूँद लेते हैं.. खो जाते हैं अपने में.. भूल जाते हैं सब कुछ.. पर सफ़र में कुछ गतिरोधक ऐसे होते हैं जो अचानक ही नज़र आते हैं और तब जीवन में लगते हैं दुःख भरे ब्रेक.. कुछ होते हैं जो फिर से आँखें बन्द कर लेते हैं पर कुछ नहीं बन्द कर पाते और कोसते रहते हैं जीवनभर.. अपनी इस सुखद यात्रा को..

सुमित के जीवन में भी दुःखों के कई ब्रेक लगे थे पर उसने कभी आँखें बंद कर सुखों का एहसास करना नहीं छोड़ा..

सुमित नहा धोकर तैयार हो गया.. संध्या ने खाना लगा दिया था.. दोनों ने साथ मिलकर खाना खाया.. खाने के टेबल पर संध्या ने फिर से सुमित को टोका.. डॉ. ने तभी कहा था कि एक साल के बाद वापस आकर दिखा देना.. चौदह साल हो गये पर तुम्हारा वो एक साल कब आयेगा पता नहीं.. क्यों करते हो ऐसा.. दिखा क्यों नहीं देते..

तुम्हें तो पता है मुझे डॉक्टर के पास जाना पसंद नहीं.. डॉक्टरों से डर लगता है.. काम धंधे पर लगा देते हैं.. ये करो.. ये मत करो.. वगैरह.. वगैरह.. पिछली बार भी तुम्हारे कहने से ही गया था.. याद है ना तुम्हें.. इतना कहकर जैसे ही सुमित ने प्लेट सरकाते हुए कुर्सी से उठना चाहा.. दर्द ने सुमित के पाँव में फिर से दस्तक दे दी.. इस बार मानो खटखटाकर नहीं दरवाज़ा तोड़कर घुस आया हो.. ज़ोर की आह निकली.. इस बार का दर्द पहले के दर्द से ज़्यादा भयंकर था.. सुमित ख़ुद को संभाल भी नहीं पा रहा था.. संध्या ने सुमित को संभाला.. और तुंरत ही डॉक्टर को फ़ोन मिलाया..

हेलो.. डॉक्टर केतन शाह.. जी नहीं.. मैं गणेश उनका असिस्टेंट.. डॉक्टर साहब ओपीडी में हैं.. कहिए.. मुझे इमरजेंसी अपॉइंटमेंट चाहिए.. इतना कहकर संध्या ने गणेश को सारी परेशानी बता दी.. अच्छा आप एक मिनट होल्ड कीजिए.. मैं पूछ कर बताता हूँ.. और एक मिनट बाद.. ठीक है आप पेशेंट को लेकर आ जाइए.. जी ठीक है.. फ़ोन रखते ही संध्या ने सुमित को देखा.. अब मैं कुछ नहीं सुनुगीं तुम्हारा.. तुम्हें चलना ही होगा.. अच्छा बाबा ठीक है.. एक काम करो साथ में पुरानी रिपोर्ट और फ़ाइल भी ले लेना.. ठीक है..

दर्द काफ़ी ज़्यादा था.. चलने में असमर्थ सा लग रहा था सुमित पर संध्या से किसी और को बुलाने या किसी की मदद लेने से मना कर दिया था.. एक पाँव से ही लंगड़ाते लंगड़ाते.. संध्या का सहारा लेते हुए.. जैसे तैसे दोनों अस्पताल पहुँच गये..

लोग एक हाथ की दूरी बनाकर बैठे थे.. हर मरीज़ के साथ कोई ना कोई आया था.. कोई पहली बार आया था.. तो किसी के हाथ में कोई रिपोर्ट थी.. जो डॉक्टर को दिखानी थी.. सभी अपने अपने नम्बर का इन्तज़ार कर रहे थे.. दरवाज़े से घुसते ही सामने और दायें बायें दोनों तरफ़ मरीज़ों के बैठने के लिए सफ़ेद बेंच बनी हुई थी.. ऊपर घूमता हुआ पंखा भी सफ़ेद रंग का था.. दीवार सफ़ेद.. सारे कर्मचारी सफ़ेद.. यहाँ तक कि घड़ी भी सफ़ेद रंग की थी.. अस्पताल पहुँचने पर आँखों से सारे रंग ही ग़ायब हो जाते हैं.. सिर्फ़ और सिर्फ़ सफ़ेद दिखाई पड़ता है हर तरफ़.. अस्पताल को रंगीन रखने में दिक्कत क्या है आज तक समझ नहीं पाया.. हो सकता है सफ़ेद रंग के पीछे कुछ वैज्ञानिक कारण छुपा हो.. या फिर जिसने भी अस्पताल के लिए सफ़ेद रंग का चुनाव किया होगा.. उसके मन में कहीं ना कहीं एक अनजाना सा लेखक छुपा होगा.. जैसे किसी भी लेखक को अगर सफ़ेद पन्ना मिल जाये तो उसे वो अपने शब्दों के रंग से भर देता है.. अस्पताल इंसान के जीवन का वो अतिरिक्त सफ़ेद पन्ना होता है जहाँ ठीक होने के बाद मरीज़ को अपने जीवन में दोबारा अपनी पसंद का रंग भरने का मौका मिलता है..

बायीं तरफ़ की बेंच पर सुमित को बिठाकर संध्या गणेश से बात करने चली गई.. और थोड़ी देर बाद वापस आकर सामने वाली बेंच पर बैठ गई.. सुमित से दर्द सहा नहीं जा रहा था.. रह रहकर थोड़ा बेचैन होने लगता सुमित.. वहाँ बैठे सभी लोगों की नज़रें सुमित को ताकने लगीं.. संध्या फिर उठी और गणेश के पास जाकर कहने लगी.. कुछ कीजिए.. उन्हें दर्द बर्दाश्त नहीं हो रहा है.. अगला हमें ही भेज दीजिए अन्दर.. गणेश संध्या के साथ सुमित के पास आया और कहने लगा.. अगर दर्द ज़्यादा है तो आप कमरे में जाकर लेट जाइए.. और उधर से सुमित का ज़वाब आया.. लेटने से दर्द कम होगा क्या..? दर्द तो दर्द है उसे क्या पता कि मैं बैठा हूँ या लेटा..? मैं यहीं ठीक हूँ.. कम से कम यहाँ देखने के लिये चेहरे तो हैं.. वरना अंदर तो पंखे के सिवा और कोई नहीं होगा.. सुमित की बातें सुनकर वहाँ बैठे सभी लोग मुस्कुराने लगे.. संध्या भी मुस्कुराई और बैठ गई.. तभी सुमित के बगल से आवाज़ आई.. क्या हुआ भाई आपके पैर में..? सुमित ने अपने बगल में देखा.. दो औरतें बुरक़ा पहने हुए बैठी थीं.. साथ मे दो बच्चे भी थे.. हाथ में एक रिपोर्ट थी.. देखने में दोनों स्वस्थ लग रहे थे.. सुमित के आने से पहले ही दोनों औरतें आपस में बैठे-बैठे बातें कर रहीं थीं.. सुमित ने ज़वाब दिया.. कुछ नहीं.. काफ़ी साल हो गये डॉक्टर से मिले.. सोचा मिल आते हैं.. तो ख़ाली हाथ क्यों आते.. तो अपना पैर लेते आये… दोनों के दोनों मुस्कुराईं और संध्या की तरफ़ देखकर बोलीं.. भाई बहुत मस्त हैं.. सच में कहीं मिलने ही तो नहीं आये.. अरे.. नहीं.. नहीं.. चौदह साल पहले इनके पाँव का ऑपरेशन हुआ था.. आज अचानक से काफ़ी ज़्यादा दर्द करने लगा.. सो मैं ले आई वरना ये तो आते भी नहीं.. दोनों की बातें सुनकर सुमित मुस्कुराने लगा..

थोड़ी ही देर बाद सुमित ने उनसे पूछा आप लोग क्यों आये यहाँ.. दूसरी वाली औरत ने ज़वाब दिया.. अरे.. हम इसकी सास की रिपोर्ट दिखाने आये हैं.. दो घण्टे हो गये पर नम्बर अभी तक नहीं आया.. सुमित ने पहली वाली से पूछा.. यह आपकी कौन लगती हैं.. उसने कहा मेरी सहेली है.. शबनम..! और मुस्कुराने लगी..

और आपका नाम..
उसने कहा.. रफ़ीज़ा..!

सुमित मुस्कुराया.. बेहद प्यारा नाम है आपका.. पहली बार सुना.. वैसे शबनम का मतलब तो पता है मुझे.. पर रफ़ीज़ा का नहीं.. क्या मतलब है आपके नाम का.. रफ़ीज़ा मुस्कुराई और बोली पता नहीं.. अब्बू ने रखा था.. सुमित ने तुरंत अपनी जेब से मोबाइल निकाला और गूगल पर ढूँढ़ने लगा.. पर वहाँ भी कुछ नहीं मिला.. देखिए गूगल भी नहीं बता पा रहा आपके नाम का मतलब.. और दोनों हँसने लगे.. संध्या भी सामने बैठे बैठे मुस्कुरा रही थी.. उसकी आँखें सुमित से कह रहीं थी कि क्या कर रहे हो.. कहीं भी शुरू हो जाते हो.. सुमित ने भी संध्या को इशारों में ही समझा दिया कि वह दो घण्टे चुपचाप तो नहीं बैठ सकता.. ये दोनों बच्चे बड़े प्यारे हैं.. दोनों आपके ही हैं.. तभी शबनम ने कहा.. नहीं.. नहीं.. ये दोनों तो मेरे हैं.. इसके तो बच्चे बड़े हैं.. कॉलेज जाते हैं.. पर बेचारी बहुत परेशान रहती है.. सुमित ने पूछा.. क्यों..? बच्चे ज़्यादा परेशान करते हैं क्या..? अरे.! नहीं भाई ये अपने शौहर से परेशान है.. शौहर से..! ऐसा क्या कर दिया आपके शौहर ने..

रफ़ीज़ा ने कहा.. शक करते हैं..

कई साल से दुबई में नौकरी कर रहे हैं.. साल में एक बार घर आते हैं.. पर हर रोज़ दिन में कम से कम दस फ़ोन तो आता ही है पर शायद ही इतने सालों में कभी ख़ैरियत पूछी हो.. सिर्फ़ सवाल ही होते हैं मेरे लिए.. कहाँ हो..? वहाँ क्यों हो..? कब से फ़ोन लगा रहा था तुम्हें.. किससे बात कर रही हो..? और भी ना जाने क्या..क्या..? बहुत ज़्यादा शक करते हैं मुझपर..और ये कहते कहते रफ़ीज़ा की आँखें नम हो गईं..

रफ़ीज़ा ने सुमित से सब कुछ ऐसे कह दिया जैसे बरसों से जानती हो उसको.. रफ़ीज़ा को देखते हुए सुमित को ऐसा लगा जैसे बहुत कुछ कहना चाहती हो उससे.. बड़े दिनों बाद रफ़ीज़ा भी कुछ अनजाना अपनापन महसूस कर रही थी.. कहना बहुत कुछ चाहती थी पर कहते कहते रुक गई.. उसकी आँखों में सच्चाई झलक रही थी.. पर वो अंदर ही अंदर ख़ुद को कोस रही थी.. मानो सुमित और संध्या की जगह वो ख़ुद को देखना चाहती हो.. सुमित ने रफ़ीज़ा से कहा.. एक काम कीजिए.. अगली बार जब आपके शौहर का फ़ोन आये तो उसके पूछने के पहले आप ही सवाल पूछ लीजिए.. अपने व्हाट्सएप्प पर अपनी ख़ूबसूरत सी डीपी लगाइए.. स्टेटस पर प्यार भरे शायरी रखिए.. करने दीजिए और शक.. देखना नौकरी छोड़कर वापस इंडिया आ जायेंगे.. रफ़ीज़ा मुस्कुराई.. और बोली.. या अल्लाह.. ये मुझसे ना हो पायेगा..

तो फिर दो रास्ते और हैं मेरे पास..
क्या..?

अगली बार जब आप ख़ुद को ज़्यादा परेशान पायें.. ख़ुद को कमरे में बंद कर लें.. और लाऊड म्युझिक में डांस करें.. देखना बहुत अच्छा लगेगा.. ना बाबा.. ये तो मुझसे नहीं हो सकता.. बच्चे क्या बोलेंगे.. अम्मी पागल हो गई है और मेरी सास तो मुझे जीने नहीं देगी..

तो फिर एक काम कीजिए.. किताबों से दोस्ती कर लीजिए.. जिसका साथ कोई नहीं देता.. उसका साथ किताबें देतीं हैं.. सुमित मुस्कुराया और रफ़ीज़ा भी.. तभी गणेश ने आवाज़ लगाई रफ़ीज़ा… अभी आपका नम्बर है आप अंदर जाइए…

मन के दर्द और शरीर के दर्द में बहुत फ़र्क़ होता है.. इतना फ़र्क़ कि कभी कोई शरीर समझ ही नहीं पाता मन को.. शायद समझना ही नहीं चाहता.. सभी तुलना करना चाहते हैं.. वो भी एक तरफ़ा.. सभी सुख से तुलना करते हैं पर दुःख से कोई नहीं करता.. दुःख.. सुख से तुलना करने पर ही आता है.. पर दुःख से तुलना करने पर अपना दुःख कम लगता है.. समाज में लोगों को कई दुःख हैं.. आप अपने दुःखों की तुलना उनके दुःखों से कर के देखिए.. देखना आपको अपना दुःख उनके दुःख से कम ही लगेगा..

सुमित को अपना दर्द मन ही मन भारी लग रहा था.. रफ़ीज़ा के दर्द ने सुमित के दर्द को हल्का कर दिया.. शायद ही सुमित रफ़ीज़ा को कभी भूल पाये..

रफ़ीज़ा रिपोर्ट दिखा कर बाहर आई.. और सुमित अंदर चला गया.. डॉक्टर ने सुमित को चेक किया.. दवाई दी.. एक्स रे निकालने को कहा.. और छ्ह महीने बाद वापस दिखाने को कहा.. सुमित डॉक्टर की केबिन से बाहर निकला.. रफ़ीज़ा बाहर ही खड़ी थी.. सिर्फ़ ये कहने के लिए..जा रही हूँ भाई.. पर आपको और आपकी बातों को हमेशा याद रखूँगी.. सुमित मुस्कुराया.. और बोला.. मैं भी याद रखूँगा तुम्हें… रफ़ीज़ा..!

© प्रशांत सिंह

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बाबाजी की यात्रा https://blog.blusparrow.in/babajikiyatra/ https://blog.blusparrow.in/babajikiyatra/#respond Fri, 31 Dec 2021 09:40:33 +0000 https://blog.blusparrow.in/?p=10

अनलॉकडाउन चल रहा है, पर लॉकडाउन जैसा ही है.. थोड़ी बहुत छूट मिली है, अत्यावश्यक वस्तुओं और सेवाओं के लिए.. धीरे धीरे ही सही जीवन पटरी पर लाने की कोशिश की जा रही है.. इन सब परिस्थितियों में कुछ किया तो नहीं जा सकता.. हाँ, मगर आप याद कर सकते हैं, उन बातों को जिसे आपने लॉकडाउन के पहले बिताया था.. ख़ासकर वो बातें जो आपने किसी नुक्क्ड़ पर दोस्तों के साथ चाय पीते पीते की होंगी.. याद करके देखिएगा.. उभर आएगी एक अलग ही मुस्कान चेहरे पर.. ऐसी ही एक बात.. याद आ गई मुझे।

हमारे एक मित्र हैं ज्ञानचंद चतुर्वेदी.. पेशे से व्यवसायी हैं, एक प्रतिष्ठित कंपनी के डिस्ट्रिब्यूटर हैं, मिट्टी से जुड़े और एकदम मज़ाकिया इंसान वैसे नाम का पूरा असर है उन पर, दुनिया का ऐसा कोई प्रश्न नहीं जिसका उत्तर उनके पास ना हो.. एक दिन मैंने उनसे पूछ लिया.. दुनिया गोल है तो दुनिया का सेंटर पॉइंट कहाँ पर है.. उन्होंने झट से.. बगल से.. एक लकड़ी उठाई और ज़मीन पर खड़ी कर दी और कहा.. यही दुनिया का सेंटर पॉइंट है.. चाहो तो माप लो.. और मुस्कुराने लगे.. मैं भी हँस दिया.. वैसे पिता द्वारा दिए नाम का वह पूरी ज़िम्मेदारी से निर्वहन करते आ रहे हैं, ऊपर से नाम के आगे चुतर्वेदी भी लगा है.. एक तो वह ऐसे ही ज्ञानी और चारों वेदों का ज्ञान तो वह जन्म के साथ ही लाये थे, इस हिसाब से मैंने उन्हें ज्ञानचंद चतुर्वेदी “महाज्ञानी” की उपाधि से नवाज़ दिया और अब उन्हें प्रेम से “बाबाजी” कहकर बुलाता हूँ।

एक शाम.. उनकी दुकान की तरफ़ से गुज़र रहा था सोचा हाल-चाल लेता चलूँ.. पूछने पर पता चला.. बाबाजी विदेश यात्रा पर गये हैं, इस साल कुछ ज़्यादा ही बिक्री कर दी थी तो कंपनी की “मुफ़्त बैंगकॉक यात्रा” वाली स्कीम में क्वालीफाई कर लिए थे और कल रात को ही रवाना हो गए, अब चार दिन बाद लौटने वाले हैं।

यह सुनकर, अच्छा तो लगा था कि बाबाजी बैंगकॉक गये हैं और साथ में उत्सुकता भी थी कि बाबाजी जब लौटेंगे तब कितना ज्ञान वहाँ से बटोर लायेंगे और बाँटेंगे हमारे बीच..जैसे तैसे दिन बीता और वो दिन आ गया जिसका मैं बड़ी बेसब्री से इन्तज़ार कर रहा था, दोपहर का वक़्त था लगभग तीन बज रहे थे, मैंने मोबाइल लिया और मिला दिया नंबर बाबाजी का..उधर से आवाज़ आई.. बोलिए बाबूसाहब..!

मैं: नमस्कार बाबाजी !

बाबाजी (मुस्कुराते हुए): जिअत रहा, जिअत रहा.. खूब चभक के पिअत रहा..!

मैं: अरे..! बाबाजी, सुना बैंगकॉक गए थे.. ख़ूब मज़े किये होंगे वहाँ.. है ना.. कुछ लाये हैं हमारे लिए भी.. या फिर.. अइसहीं खाली हाथ झुलाये चले आये।

बाबाजी: सही सुना है बिल्कुल.. गया तो था.. पर अभी थोड़ा व्यस्त हूँ.. हफ़्ते भर बाद तो आज दुकान आया हूँ.. ऐसा करो.. शाम को साढ़े सात बजे… नुक्कड़ पर यादवजी की चाय की दुकान पर मिलो.. वहीं बात की जाएगी.. फुरसत में.. एकदम बीधिवत.. वैसे भी.. कुछ बातें ऐसी होती हैं जो फ़ोन पे शोभा नहीं देतीं.. समझे बाबूसाहब..!

मैं: बिल्कुल.. बिल्कुल.. ठीक है.. फिर यादवजी के यहाँ ही मुलाकात होगी साढ़े सात बजे.. रखता हूँ.. नमस्कार.!

फोन रखते ही मैंने घड़ी की तरफ देखा..बस साढ़े चार घण्टे और बचे थे मुलाकात के लिए.. मैंने भी सोचा अपने सारे काम फटाफट निपटा लूँ और समय से पहुँच जाऊँ यादवजी के यहाँ.. लगभग तीन घण्टे के भीतर मैं अपना काम ख़त्म कर निकल पड़ा ऑफिस से.. ठीक सात बजे पहुँच गया मैं यादवजी के यहॉं।

यादवजी की चाय की दुकान की दो बड़ी ख़ासियत है, पहली तो उनके यहाँ पाँच क़िस्म की चाय मिलती है.. बिना दुध की नींबू वाली मसाला चाय, सादी चाय, स्पेशल चाय, महाराजा चाय और सुंदरी चाय और दूसरी ख़ासियत, बम्बई जैसे शहर में इतनी बड़ी चाय की दुकान का होना और दुकान के बाहर कम से कम पचास लोंगों के बैठने की जगह, यही अपने आप में सबसे बड़ी उपलब्धि है.. इसलिए सुबह साढ़े पाँच बजे से रात के ग्यारह बजे तक यहाँ लोगों का जमावड़ा बना ही रहता है, मैंने भी धीरे से एक कुर्सी खींची और एक कुर्सी सामने रख कर अपना बैग उस पर रख दिया और बाबाजी का इन्तज़ार करने लगा, मन में उत्सुकता बढ़ती ही जा रही थी.. और बार-बार नज़र घड़ी की ओर चली जाती, कि कब साढ़े सात बजेंगे..तभी अचानक बुलेट की आवाज़ कानों में पड़ी.. नज़र घुमाकर देखा तो बाबाजी अपनी बुलेट पर डुगडुगाते चले आ रहे हैं।

गाड़ी खड़ी कर, मुस्कुराते हुए वह मेरे पास आए और आते ही गले लगा लिया.. और पूछा, कैसे हो बाबूसाहब.?
मैंने कहा.. बढ़ियाँ.. आप कैसे हैं.. जवाब आया.. एकदम मज़े में.. और मैंने सामने रखी कुर्सी को उनकी तरफ़ सरका दिया.. और छोटू को आवाज़ लगाई… छोटू.. दो..निम्बू मसाला चाय.. तभी बाबाजी मुझे रोकते हुए बोले.. नहीं छोटू.. मसाला नहीं.. दो.. सुंदरी ले आना आज.. आज सुंदरी पीने का मन है.. मैंने कहा ठीक है.. आज सुंदरी ही पी लेते हैं, वैसे भी.. आज की शाम आपके नाम है.. हम तो आज सिर्फ़ सुनने ही आये हैं.. बोलना तो सब कुछ आपको ही है.. और बताइए.. कैसा रहा बैंगकॉक..? बताया भी नहीं आपने और चुपचाप ही चले गए, अगर उस दिन आपके दुकान ना गया होता तो शायद ही मुझे पता चल पाता कि आप कहीं गए भी हैं।

बाबाजी: अरे.. नहीं.. नहीं.. ऐसा नहीं है, बता नहीं पाया उसके पीछे का कारण दूसरा है और अगर बता के नहीं जाते तो आने के बाद बता देते, सब कुछ इतना अचानक हुआ कि किसी को बताने का मौका ही नहीं मिला, बस.. जाने के दो दिन पहले ही फ़ोन आया था कि आप क्वालीफाई कर गए हैं, तैयारी कर लीजिए.. तैयारी करने में ही दिन निकल गए, एक तो पहली बार देश के बाहर कहीं जा रहा था मेरे अलावा और ग्यारह लोग थे, मैंने तो पहली बार क्वालीफाई किया था बाक़ी तो सब दिग्गज़-दिग्गज़ लोग थे जो हर साल कहीं ना कहीं, किसी ना किसी जगह कंपनी के खर्चे पर जलसा कर आते थे। मैं भी थोड़ा उत्साहित था कि घूमने के साथ साथ कुछ नये लोगों से मुलाकात भी हो जायेगी और दोस्ती भी, जिससे कुछ ना कुछ फ़ायदा ज़रूर मिलेगा, इसलिए सोचा घूम आते हैं।

और, उतने में ही छोटू आ गया..सेठ, ये लीजिए आप लोगों की चाय..मैंने छोटू के हाथ से दोनों ग्लास लेकर, एक ग्लास बाबाजी की तरफ़ बढ़ाकर कहा..लीजिए चाय लीजिए.. फिर चाय की चुस्की लेते हुए मैंने पूछा.. यात्रा का अनुभव कैसा रहा..?

बाबाजी: एकदम जबर.. क्या अनुभव था कमाल का और शायद ही मुझे ऐसा अनुभव कहीं और मिल पाता.. आज भले ही इस वक़्त तुम्हारे साथ यहाँ हूँ मैं.. पर मेरा मन अभी वहीं भटक रहा है.. मन नहीं कर रहा था वापस आने का.. एकदम गज़ब की जगह है यार..! मैं तो कहता हूँ हर इंसान को अपने जीवन में एक बार बैंगकॉक जरूर जाना चाहिए, बल्कि अगर मेरा सुझाव मानो तो हम लोग जो साल में एक बार पिकनिक का आयोजन करते हैं ना, वो यहाँ-वहाँ जाने से बेहतर होगा की बैंगकॉक ही जाया जाए.. ज़्यादा महँगा भी नहीं है, बल्कि उतने ही खर्चे में सब हो जाएगा।

मैं: क्या बात कर रहें हैं.. बाबाजी… मतलब इतनी मोहब्बत हो गई आपको बैंगकॉक से.. आप तो पूरा बदल कर आये हैं अपने आपको.. एकदम बाबाजी से नये बाबाजी बन गये हैं.. कुछ तस्वीरें खींचे हों तो दिखाइए।

बाबाजी: अरे बाबूसाहब.! तस्वीर तो दिखायेंगे ही, तुम्हें दिखाने के लिए ही तो खींची है, भेज दूँगा तुम्हें व्हाट्सएप्प पर आराम से देख लेना, अभी तो प्रयत्क्ष तुम्हारे सामने ही खड़ा हूँ अपने मुखार बिंदु से पूरी यात्रा करवाता हूँ तुम्हें..(इतना कहकर बाबाजी ज़ोर से हँस पड़े)

सुनो.. यहाँ से रात की फ्लाइट ली थी, तक़रीबन सुबह साढ़े छ: बजे के आस पास लैंड हुए बैंगकॉक.. एयरपोर्ट के बाहर ही कंपनी ने एक वॉल्वो बस का इन्तज़ाम कर रखा था.. फिर हम सब लोग उस बस में बैठकर वहाँ से सीधा रवाना हुए पटाया की तरफ़, तक़रीबन डेढ़ सौ किलोमीटर का सफ़र था..पटाया पहुँचने पर बस एक होटल पर रूकी.. होटल ए-वन.. हमारी मंज़िल आ गई थी.. कंपनी की तरफ़ से मिस्टर एंथोनी जो पटाया में ही रहते थे.. उन्होंने ही पूरे कार्यक्रम की देख रेख कर रखी थी.. सभी को अपने-अपने कमरे की चाभी दे दी गई और फ्रेश होकर मिलने के लिए कहा गया, फिर घण्टे भर बाद सभी लोग तैयार होकर ब्रेकफास्ट टेबल पर मिले.. नाश्ता करते करते पूरे तीन दिन का विवरण एंथोनी ने हम सभी को दे दिया, हमें दो दिन पटाया और आख़िरी का दिन बैंगकॉक में घूमना था.. जिसमें पटाया में दिनभर कुछ साइटसीइंग और वाटर एडवेंचर करना था और शाम को वाकिंग स्ट्रीट घूमना था, मेरे लिए तो सब कुछ नया था पर मैंने यह गौर किया कि जब एंथोनी ने वाकिंग स्ट्रीट का नाम लिया था तो बाक़ियों के चेहरे पर एक अलग ही मुस्कान आ गई थी।

मैं: फिर..

बाबाजी: फिर क्या, इतना कहकर एंथोनी चला गया यह कहकर की एक घण्टे बाद हमें निकलना है। वहाँ टेबल पर बैठे-बैठे हम सब लोगों ने एक दूसरे का परिचय दिया, तक़रीबन तक़रीबन सभी लोग एक ही उम्र के थे, थोड़ी ही देर में सब आपस में यूँ घुल मिल गए जैसे मानो बरसों का रिश्ता रहा हो, पर इतनी जल्दी यूँ किसी से घुल मिल जाना मेरी समझ के परे था.. पर सब घुल गए तो मैं क्यों पीछे हटता.. उन सब में मेरी सबसे अच्छी दोस्ती नितिन से हुई.. वह पाँचवीं बार आया था.. वहाँ के हर गली मोहल्ले से बिल्कुल अच्छी तरह वाकिफ़ था।

घण्टा भर बीत चुका था, एंथोनी वापस आ गया और हम निकल पड़े साइटसीइंग के लिए.. उसी दरम्यान मैंने नितिन को पूछ लिया.. यार..नितिन.. एक बात बताओ.. ये वाकिंग स्ट्रीट का नाम लेते ही सबकी आँखों मे गुलाब क्यों खिल जाता है ? नितिन ने मुस्कुराते हुए शायराना अंदाज़ में कहा…

“जब शराब-ओ-शबाब मिल जाता है
तब आँखों में गुलाब खिल जाता है”

मैं समझ गया कि आज की शाम रंगीन होने वाली है, साइटसीइंग के बाद हम फिर से होटल आ गए.. शाम हो गई और हम सब निकल पड़े वाकिंग स्ट्रीट के लिए.. सभी का बर्ताव कुछ बदला बदला सा लग रहा था सब के सब छत्तीस के उम्र में छब्बीस सा व्यवहार कर रहे थे.. एक अलग ही ख़ुशी थी सबके चेहरे पर.. फिर कुछ ही देर में हम सब के सब पहुँच गए वाकिंग स्ट्रीट।

मैं: फिर..

बाबाजी: फिर… मैं तो वहाँ का नज़ारा देखकर ही चकरा गया बाबूसाहब.. वह एक अलग ही दुनिया है.. एक अलग ही रंगीनियत.. लाल और नीली चमचमाती रोशनी.. हर तरफ हसीन चेहरे.. हुस्न का बाज़ार लगा था.. ऐसी गज़ब-गज़ब की देखते ही पंखा पकड़ लोगे.. जितना सुना था उससे कहीं ज़्यादा ही रंगीन था सब कुछ मेरे लिए.. ज़ोर-ज़ोर से बजते हुए हॉलीवुड, बॉलीवुड और भोजपुरी फ़िल्मों के गाने.. “तू लगावे लू जब लिपिस्टिक, हीलेला सारा डिस्ट्रिक… थाईलैंड में यह गाना सुनकर तो मैं भी हिल गया.. मन ही मन मुस्काया यह सोचकर की पवन सिंह ने यहाँ भी धमाल मचाया हुआ है.. सब कुछ था वहाँ खाने को और पीने को.. व्हिस्की.. बियर.. वोडका.. रम और भी बहुत कुछ.. पर एक बात जो सबसे अच्छी लगी वो ये थी.. कि सभी मस्त थे अपनी मस्ती में, किसी को किसी से कुछ लेना देना नहीं था.. जो ख़रीददार थे वो ख़रीद कर मस्त थे, जो बेचनेवाले थे वो बेचकर मस्त थे और कुछ मेरे जैसे तमाशबीन थे जो यह सब तमाशा देखकर मस्त थे पर सब के सब थे मस्ती में यहाँ.. तभी अचानक मैंने पीछे मुड़कर देखा.. सब के सब लापता सिवाय नितिन के.. मैंने नितिन से पूछा.. अरे.! कहाँ गए सब के सब.. नितिन ने फिर उसी शायराना अंदाज़ में कहा..

व्यर्थ की चिंता छोड़ो तुम सब मिल ही जायेंगे
कुछ देर में तेरी आँखों में गुल खिल ही जायेंगे
अब कह दो तुम्हारी नज़रों को ढूँढ़ना बन्द करें
रात बीतने दो फिर होंठ तेरे भी सिल ही जायेंगे

इतना कहकर उसने मेरा हाथ पकड़ा और खींचता हुआ एक पब में लेकर चला गया.. डी.जे. वाले बाबू के गानों के शोर के बीच, हम जाकर एक टेबल पर बैठ गये।
क्या लेंगे.. व्हिस्की या बियर?
मैंने पूछा, तुम..?
उसने कहा, मैं तो व्हिस्की लूँगा और मैंने कहा, मैं बियर..
नितिन ने व्हिस्की और बियर के साथ-साथ कुछ स्टार्टर भी आर्डर कर दिया.. तक़रीबन तीन घण्टे हमने वहीं बिताए, रात के दस बज रहे थे.. अचानक नितिन ने मुझसे पूछा.. फिर चला जाये फूल खिलाने..
मैंने कहा.. मैं कुछ समझा नहीं.. क्या कहना चाहते हो?

नितिन: इतने भी भोले मत बनो.. जितने दिखते हो.. मुझे पता है तुमको सब समझ आ रहा है… मैं इन ख़ूबसूरत तितलियों की बात कर रहा हूँ.. जो अभी यहाँ उड़ रहीं हैं.. ले चलते हैं इन्हें अपने साथ बग़ीचा दिखाने.. वरना सुबह सब पूछेंगे होटल पर..की रात कैसी गुज़री.. तब क्या जवाब दोगे.. जल्दी बताओ.. वरना मैंने तो अपने लिये पसंद कर ली है इनमें से एक तितली.. थोड़ी देर में उड़ जाऊँगा उसके साथ मैं..फिर कुछ मत कहना बाद में.. सोच लो अभी भी वक़्त है.. क्या पता फिर मौका मिले ना मिले.. और ज़िंदगी भर इस बात और मौके का अफ़सोस हो तुम्हें।

नशे में आदमी बहकता है.. सुना था, पर आप जब ख़ुद नशे में होते हो.. तो.. ना कहावतें याद आती हैं.. ना ही कुछ और.. और ऐसे दोस्तों का साथ हो तो न चाहते हुए भी आपको बहका ही देते हैं.. मैं सोच में पड़ गया था कि क्या करूँ.. तभी मुझे मेरे दादाजी की एक बात याद आ गई जो वह अक्सर कहा करते थे..”मर जाइ जिउ, त के खाई घिउ..!” बस इस लाइन ने ही मुझे प्रेरित किया और मैंने नितिन से कहा.. नितिन भाई.. आज मुझे भी उड़ना है इन तितलियों संग.. डूबना है गुलाब की गहराइयों में.. मुझे भी तो जवाब देना है सुबह.. की रात कैसी गुज़री है।

ये हुई ना मर्दों वाली बात.. ऐसा कहते हुए नितिन ने ज़ोर से मेरी पीठ पर हाथ मारा.. आज तो तुम जन्नत की सैर करने वाले हो.. ज़िंदगी भर नहीं भूल पाओगे आज की रात.. फिर नितिन वहाँ से उठा और सामने खड़ी लड़कियों से बात करने चला गया।

मैं: बाबाजी.. एक मिनट… अरे छोटू ! दो सुंदरी और लाना.. पियेंगे ना..?

बाबाजी: हाँ.. हाँ.. क्यों नहीं.. चाय के लिए कभी पूछा मत करो.. बस मँगा दिया करो..

मैं: फिर.. आगे क्या हुआ..?

बाबाजी: और फिर.. हमारी गाड़ी एक होटल पर रुकी.. होटल हिल्टन.. नितिन ने फ़ोन पर ही कमरे बुक करवा लिए थे.. रिसेप्शन काउंटर से चाभी लेकर उसने मुझे मेरे कमरे की चाभी दे दी.. और वह अपनी वाली के साथ अपने कमरे में चला गया..और जाते जाते मुस्कुराकर बोला..बेस्ट ऑफ लक.. मैं भी मुस्कुराया.. और चुपचाप अपने कमरे की तरफ बढ़ने लगा.. उसने भी मेरा हाथ पकड़ लिया और मेरे साथ चलने लगी.. एक करंट सा लगा मुझे.. सब कुछ ऐसा था मानो ख़्वाब देख रहा हूँ मैं.. उसका नाम तक नहीं जानता था.. कितना अजीब है ना.. जिसका नाम तक नहीं जानता उसका हाथ पकड़ उसके साथ रात गुज़ारने जा रहा था मैं.. बेहद खूबसूरत थी वो.. एकदम दूध सी सफ़ेद.. एक अलग ही महक थी उसकी.. मैंने कमरे का दरवाज़ा खोला और हम अंदर आ गये.. अंदर आते ही उसने दरवाज़ा बन्द कर दिया।

मैं: फिर…

बाबाजी: मैं सामने रखी कुर्सी पर बैठ गया और वह पलंग पर बैठ गई.. मैंने उससे उसका नाम पूछा.. मुस्कुराते हुए उसने अपने पर्स से पहचान पत्र और मेडिकल सर्टिफिकेट दिखाया मुझे.. जिस पर एचआईव्ही टेस्ट की जानकारी..जो कि निगेटिव्ह थी और उसका नाम बोल्ड अक्षरों में लिखा था..”एलिना” (Alina).. पूरे पाँच घण्टे बिताने वाली थी मेरे साथ.. मैं थोड़ा सहमा जरूर था पर अंदर से उत्साहित बहुत था..उसने मुझे इशारे से अपने पास बुलाया और मैं उठकर उसके पास जाकर बैठ गया..उसने अपना एक हाथ मेरी जाँघ पर रख दिया और धीरे से मुझे सहलाने लगी.. फिर मैं भी ख़ुद को रोक न पाया.. उसे पकड़ कर लेट गया पलंग पर.. थोड़ी ही देर में उसने मेरे सारे कपड़े निकाल दिये.. और इस क़दर मुझे चूमने लगी कि क्या बताऊँ बाबूसाहब..! मेरे पास शब्द ही नहीं हैं.. पर यहीं एक दिक्कत आ गई।

मैं: कैसी दिक्कत..? बाबाजी..

बाबाजी: अरे.! मैं मन ही मन संभोग करने के लिए इतना उत्साहित हो चुका था कि कुछ करने से पहले ही उसकी इस प्रेमक्रीड़ा ने मुझे बाद में मिलने वाले चरम सुख का आनंद पहले ही करा दिया.. स्थिर हो चुका था मैं और शांत भी.. उससे तो दूर.. ख़ुद से भी नज़रें नहीं मिला पा रहा था.. क्या सोचा था और क्या हो गया.. उस वक़्त समझ आया कि हद से ज़्यादा उत्साह भी किसी काम के लिए ठीक नहीं होता।

तभी एलिना ने मुझसे कहा Don’t worry, this usually happens in excitement.
Do one thing keep calm and relax.
I will ready you up for the next round. If you are not able to get satisfied with me I will return your money back.

मैं: क्या बात है.. एकदम गज़ब.. मनी बॅक गारन्टी.. फिर आगे..

बाबाजी: फिर उसने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे बाथटब में ले गई, वहाँ उसने मुझे नहलाया और मेरा मसाज किया.. एकदम गज़ब का मसाज था वो.. शायद ही अपने जीवन में दोबारा उस मसाज का अनुभव कर पाऊँगा.. कुछ मानो या ना मानो बाबूसाहब.. पर यह बात तो तुम्हें माननी पड़ेगी.. गज़ब का हुनर होता है उनके पास.. शरीर में कौन सी नसें कहाँ होती है.. सब पता होता है उन्हें और किस नस को दबाने से कौन सा हिस्सा एक्टिव होता है.. आधे ही घण्टे में उसने मुझे फिर उत्साह से भर दिया.. और फिर गुलाब की गहराइयों में डूबने का सिलसिला रातभर चलता रहा।

दूसरे दिन सुबह जब हम सब लोग ब्रेकफास्ट टेबल पर मिले.. तो ऐसा लगा जैसे सब के सब वर्ल्ड कप जीतकर आये हों, एक अलग ही ख़ुशी थी सबके चेहरे पर.. उस वक़्त मुझे एहसास हुआ कि वाकिंग स्ट्रीट का नाम लेते ही सबकी आँखों में गुलाब क्यों खिल जाते हैं.. और ठीक उसी वक़्त इस बात का भी एहसास हुआ कि आज सुबह जब एक दूसरे का परिचय हो रहा था तब इतने जल्दी सब क्यों घुल मिल गए थे.. सब जानते थे एक दूसरे के बारे में की सब ने रात कहाँ गुज़ारनी है.. पर कोई किसी को कुछ कहता नहीं है.. आख़िर विश्वास का गहरा रिश्ता जो है हम सब में।

मैं: फिर..

बाबाजी: फिर क्या… दूसरे दिन तो पूरा वाकिंग स्ट्रीट में ही गुज़ारा सब ने.. अगली सुबह निकलना जो था वहाँ से..

मैं: बाबाजी.. दूसरे दिन फिर एलिना…

बाबाजी: नहीं.. अब की बार.. एंजेल (Angel) थी.. पर सर्विस में कोई समझौता नहीं.. फिर अगली सुबह हम सब बैंगकॉक लौट आये.. इंदिरा मार्केट में शॉपिंग की.. फिर एयरपोर्ट..और मुंबई के लिए रवाना।

इतना कहकर बाबाजी ने अपने बैग से टिन का बना हुआ लंबा काला डिब्बा निकाला.. और मेरे हाथ मे थमा कर बोले.. ये तुम्हारे लिए गुरु… जीम बीम व्हिस्की की बोतल थी.. मैं भी मुस्कुराया और वो भी।

मैं: शुक्रिया बाबाजी..! आज का दिन याद रहेगा जीवन भर मुझे.. जैसे याद रहेगी आपको.. आपकी ये यादगार यात्रा.. मज़ा आ गया.. दो घण्टे बीत गए.. पता ही नहीं चला.. चलिए.. अब घर निकलते हैं.. घर पर सब इंतज़ार कर रहे होंगे।

बाबाजी: हाँ.. हाँ.. निकलते हैं.. चलो तुमको भी घर छोड़ते हुए वहीं से निकल जाऊँगा मैं भी.. और बुलेट पर बैठकर हम घर की तरफ निकल पड़े।

तभी बाबाजी ने कहा.. एक बात कहूँ बाबूसाहब..!

मैं: जी ज़रूर.. ज़रूर..

बाबाजी: एलिना और एंजेल ने मुझे एक सीख दी है जो मैं कभी भूल नहीं सकता.. हम लोग यहाँ अपने शहर, अपने गाँव, अपने देश में रहकर.. छोटी-बड़ी नौकरी या व्यवसाय करते हैं.. दिन भर में न जाने कितनी बार झूठ बोलते हैं.. ग्राहकों को हज़ारों बार झूठ बोलकर सामान बेचा है.. सर्विस के नाम पर.. सर्विस का ‘एस’ भी नहीं देते हम लोग.. भले ही वे दोनों एक कॉल गर्ल का काम कर रहीं थीं.. पर अपने काम के प्रति कितनी वफ़ादार थीं.. अपने काम को पूरी निष्ठा और ईमानदारी से कैसे करना चाहिए.. ये हुनर कोई उनसे सीखे.. मान लो, अगर अपने देश में सब लोग अपना काम पूरी निष्ठा और ईमानदारी से करें तो शायद देश को “सोने की चिड़िया” बनाने से कोई नहीं रोक सकता.. क्यों सही कहा ना मैंने.. इतना कहते ही बाबाजी ज़ोर से हँस पड़े।

मैं: जी बिल्कुल.. और मुस्कुराते हुए मैंने बोला.. फिर तो इस हुनर को सीखने सबको जीवन में एक बार बैंगकॉक ज़रूर जाना चाहिए.. ताकि देश जल्द से जल्द “सोने की चिड़िया” बन सके.. और दोनों साथ में ज़ोर से हँस पड़े।

फिर मुझे घर छोड़.. बाबाजी अपने घर चल दिये..और मैं ख़यालों में बैंगकॉक..

© प्रशांत सिंह

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