रफ़ीज़ा
सर्दियों का मौसम था.. सुबह के नौ बज रहे थे.. रात की नींद काफ़ी देर से हुई थी.. इसलिए आँखें खुलने का नाम नहीं ले रही थीं.. संध्या सुमित को कब से आवाज़ लगाये जा रही थी पर सुमित है कि बिस्तर छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहा...
बाबाजी की यात्रा
अनलॉकडाउन चल रहा है, पर लॉकडाउन जैसा ही है.. थोड़ी बहुत छूट मिली है, अत्यावश्यक वस्तुओं और सेवाओं के लिए.. धीरे धीरे ही सही जीवन पटरी पर लाने की कोशिश की जा रही है.. इन सब परिस्थितियों में कुछ किया तो नहीं जा सकता.. हाँ, मगर आप याद कर...