रफ़ीज़ा

सर्दियों का मौसम था.. सुबह के नौ बज रहे थे.. रात की नींद काफ़ी देर से हुई थी.. इसलिए आँखें खुलने का नाम नहीं ले रही थीं.. संध्या सुमित को कब से आवाज़ लगाये जा रही थी पर सुमित है कि बिस्तर छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था… दो मिनट.. दो मिनट कहकर सुमित ने और आधे घण्टे बिस्तर में गुज़ार दिए.. आख़िरकार रसोई से ज़ोर से आवाज़ लगाई संध्या ने.. तुम उठते हो कि नहीं अब.. तुम्हें बैंक भी जाना है.. चेक भी डिपॉजिट करना है.. फिर वहाँ से लौटते वक़्त त्रिभुवन डेरी से पनीर भी लाना है.. पता नहीं कब उठोगे.. कब तैयार होगे और ना जाने कब जाओगे.. इस लॉक डाउन में तो तुम बहुत ही आलसी हो गए हो.. बताओ.. दस बजने को है.. अभी तक बदन पर पानी भी नहीं पड़ा..!
इतना सब सुनने के बाद सुमित उठकर बैठ गया.. थोड़ी देर बैठने के बाद सरकते हुए जैसे ही उसने चारपाई से अपने कदम ज़मीन पर रखे और खड़े होने लगा.. एक ज़ोर की कराह उसके मुँह से निकली..” आह..ह..ह…” ऑंखों के सामने घना अँधेरा छा गया और वो वहीं चारपाई पर बैठ गया.. सुमित का बायाँ पाँव सीधा होने का नाम ही नहीं ले रहे था.. घुटने के ऊपर थोड़ी सूजन भी हो गई थी.. रसोई से संध्या दौड़ती हुई आई.. और सुमित पर चिल्लाने लगी.. और नाचो.. मना किया था ना.. गुड्डू की शादी में मत नाचना.. कल रात खूब उछल उछल कर नाच रहे थे.. जब इंसान को पता हो कि हमें फलाँ चीज़ से तक़लीफ़ है तो वह काम नहीं करना चाहिए.. पर नहीं.. हमें तो नाचना है.. तो नाचो.. वैसे भी तुम मेरी सुनते ही कहाँ हो..
सुमित ने दर्द में मुस्कुराते हुए कहा.. हाँ.. हाँ.. सत्रह साल से तो कोई और ही सुन रहा है ना.. ख़ैर.. अभी वो सब छोड़ो और इस दर्द का कुछ करो मैं सहन नहीं कर पा रहा हूँ.. संध्या सुमित के पैर पकड़ कर धीरे-धीरे सीधा करने की कोशिश करने लगी पर सुमित का दर्द देखकर रूक गई.. तभी सुमित ने संध्या से कहा.. सुनो.. एक काम करो.. थोड़ा नमक तवे पर गर्म करो और सूती कपड़े में बाँध कर दो.. थोड़ा सेंकता हूँ.. शायद कुछ फ़र्क़ पड़े.. इतना सुनते ही संध्या रसोई में चली गई।
सुमित और संध्या.. दोनों ने प्रेम विवाह किया था.. एक दूसरे से जितना तू-तू मैं-मैं था.. उससे कहीं ज़्यादा दोनों में प्रेम था.. और ये बात.. दोनों ही अच्छी तरह जानते थे.. अगर किसी के दाम्पत्य जीवन में प्रेम ढूँढ़ना है तो उनकी तू-तू मैं-मैं ज़रूर सुनें.. उनकी बातों में सच्चे प्रेम की झलक अवश्य दिखाई देगी..
सुमित.. था तो मनमौजी पर भीतर से उतना ही संवेदनशील.. पर कभी जताया नहीं किसी को.. बहुत लोगों से दोस्ती थी उसकी.. रोज़ काम के बाद कहीं किसी से मिलना आदत थी उसकी.. लोगों के साथ मिलना जुलना.. नाचना गाना.. हँसी मज़ाक पसन्द था उसे.. तकरीबन चौदह साल पहले की बात है.. एक दिन सुमित किसी दोस्त के घर सीढ़ियों से फ़िसल कर गिर गया था.. पैर के बायें घुटने के निचले हिस्से पर काफ़ी गहरी और अंदरूनी चोट लगी.. पर उसने नज़रन्दाज़ कर दिया.. घर आकर भी बताया नहीं किसी को.. कुछ महीने बीते.. इस दरम्यान कभी कभी थोड़ा दर्द उठता तो मलहम लगाकर मालिश कर लेता.. करीबन छह महीने बाद अचानक दर्द काफ़ी बढ़ गया.. डॉक्टर के पास ले जाया गया.. एक्स-रे.. एम आर आई.. सब कुछ निकालने के बाद पता चला.. उस चोट ने गाँठ का रूप ले लिया है.. ऑपेरशन कर निकालना होगा.. उस वक़्त ये सब देखकर संध्या बहुत परेशान हुई और सुमित से कहा वक़्त रहते ही अगर इलाज़ कर लिया होता तो ये चोट आज गाँठ में तब्दील ना होती पर सुमीत उस वक़्त भी शायराना अंदाज़ में संध्या से कहता है.. “इस चोट की गाँठ तो निकल जायेगी.. पर उनका क्या जो बातों से लगी हैं…”
ऑपरेशन हुआ.. करीबन एक महीने तक बिस्तर पर रहने के बाद थोड़ा थोड़ा चलना शुरू किया सुमित ने.. और फिर धीरे धीरे ठीक हो गया.. पर डॉक्टर ने हिदायत दी थी अब हमेशा थोड़ा सम्भालना होगा.. चौदह साल हो गये इस बात को.. पर सुमित वैसा का वैसा ही.. कुछ नहीं बदला सिवाय उम्र के.. ख़ैर
संध्या गर्म नमक कपड़े में बाँध लाई और सुमित के पाँव को सेंकने लगी.. सुमित के चेहरे पर थोड़ी राहत साफ झलक रही थी.. सुमित को एहसास होने लगा सुख का और उसने अपनी आँखें मूँद लीं..
आप जब बस में सफ़र कर रहें हों.. और खिड़की से आती हवा आपके चेहरे को चूम रही हो.. तब आप धीरे धीरे नींद की आगोश में समा जाते हैं.. एक अलग ही सुकून मिलता है.. ठीक उसी वक़्त गतिरोधक आने पर अगर बस का ड्राइवर अचानक से ब्रेक लगा दे तब आपकी सुख भरी नींद टूट जाती है.. तब आप मन ही मन उसे कोसने लगते हैं.. पर कुछ ही देर बाद आप दोबारा कोशिश करते हैं.. और आपकी आँखें फिर बन्द होने लगती हैं.. और आप पा जाते हैं उस खोये हुए सुख को दोबारा..
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जीवन भी बस में यात्रा करने जैसा ही है.. सुख की हवा जब खिड़की से आती है तब हम आँखें मूँद लेते हैं.. खो जाते हैं अपने में.. भूल जाते हैं सब कुछ.. पर सफ़र में कुछ गतिरोधक ऐसे होते हैं जो अचानक ही नज़र आते हैं और तब जीवन में लगते हैं दुःख भरे ब्रेक.. कुछ होते हैं जो फिर से आँखें बन्द कर लेते हैं पर कुछ नहीं बन्द कर पाते और कोसते रहते हैं जीवनभर.. अपनी इस सुखद यात्रा को..
सुमित के जीवन में भी दुःखों के कई ब्रेक लगे थे पर उसने कभी आँखें बंद कर सुखों का एहसास करना नहीं छोड़ा..
सुमित नहा धोकर तैयार हो गया.. संध्या ने खाना लगा दिया था.. दोनों ने साथ मिलकर खाना खाया.. खाने के टेबल पर संध्या ने फिर से सुमित को टोका.. डॉ. ने तभी कहा था कि एक साल के बाद वापस आकर दिखा देना.. चौदह साल हो गये पर तुम्हारा वो एक साल कब आयेगा पता नहीं.. क्यों करते हो ऐसा.. दिखा क्यों नहीं देते..
तुम्हें तो पता है मुझे डॉक्टर के पास जाना पसंद नहीं.. डॉक्टरों से डर लगता है.. काम धंधे पर लगा देते हैं.. ये करो.. ये मत करो.. वगैरह.. वगैरह.. पिछली बार भी तुम्हारे कहने से ही गया था.. याद है ना तुम्हें.. इतना कहकर जैसे ही सुमित ने प्लेट सरकाते हुए कुर्सी से उठना चाहा.. दर्द ने सुमित के पाँव में फिर से दस्तक दे दी.. इस बार मानो खटखटाकर नहीं दरवाज़ा तोड़कर घुस आया हो.. ज़ोर की आह निकली.. इस बार का दर्द पहले के दर्द से ज़्यादा भयंकर था.. सुमित ख़ुद को संभाल भी नहीं पा रहा था.. संध्या ने सुमित को संभाला.. और तुंरत ही डॉक्टर को फ़ोन मिलाया..
हेलो.. डॉक्टर केतन शाह.. जी नहीं.. मैं गणेश उनका असिस्टेंट.. डॉक्टर साहब ओपीडी में हैं.. कहिए.. मुझे इमरजेंसी अपॉइंटमेंट चाहिए.. इतना कहकर संध्या ने गणेश को सारी परेशानी बता दी.. अच्छा आप एक मिनट होल्ड कीजिए.. मैं पूछ कर बताता हूँ.. और एक मिनट बाद.. ठीक है आप पेशेंट को लेकर आ जाइए.. जी ठीक है.. फ़ोन रखते ही संध्या ने सुमित को देखा.. अब मैं कुछ नहीं सुनुगीं तुम्हारा.. तुम्हें चलना ही होगा.. अच्छा बाबा ठीक है.. एक काम करो साथ में पुरानी रिपोर्ट और फ़ाइल भी ले लेना.. ठीक है..
दर्द काफ़ी ज़्यादा था.. चलने में असमर्थ सा लग रहा था सुमित पर संध्या से किसी और को बुलाने या किसी की मदद लेने से मना कर दिया था.. एक पाँव से ही लंगड़ाते लंगड़ाते.. संध्या का सहारा लेते हुए.. जैसे तैसे दोनों अस्पताल पहुँच गये..
लोग एक हाथ की दूरी बनाकर बैठे थे.. हर मरीज़ के साथ कोई ना कोई आया था.. कोई पहली बार आया था.. तो किसी के हाथ में कोई रिपोर्ट थी.. जो डॉक्टर को दिखानी थी.. सभी अपने अपने नम्बर का इन्तज़ार कर रहे थे.. दरवाज़े से घुसते ही सामने और दायें बायें दोनों तरफ़ मरीज़ों के बैठने के लिए सफ़ेद बेंच बनी हुई थी.. ऊपर घूमता हुआ पंखा भी सफ़ेद रंग का था.. दीवार सफ़ेद.. सारे कर्मचारी सफ़ेद.. यहाँ तक कि घड़ी भी सफ़ेद रंग की थी.. अस्पताल पहुँचने पर आँखों से सारे रंग ही ग़ायब हो जाते हैं.. सिर्फ़ और सिर्फ़ सफ़ेद दिखाई पड़ता है हर तरफ़.. अस्पताल को रंगीन रखने में दिक्कत क्या है आज तक समझ नहीं पाया.. हो सकता है सफ़ेद रंग के पीछे कुछ वैज्ञानिक कारण छुपा हो.. या फिर जिसने भी अस्पताल के लिए सफ़ेद रंग का चुनाव किया होगा.. उसके मन में कहीं ना कहीं एक अनजाना सा लेखक छुपा होगा.. जैसे किसी भी लेखक को अगर सफ़ेद पन्ना मिल जाये तो उसे वो अपने शब्दों के रंग से भर देता है.. अस्पताल इंसान के जीवन का वो अतिरिक्त सफ़ेद पन्ना होता है जहाँ ठीक होने के बाद मरीज़ को अपने जीवन में दोबारा अपनी पसंद का रंग भरने का मौका मिलता है..
बायीं तरफ़ की बेंच पर सुमित को बिठाकर संध्या गणेश से बात करने चली गई.. और थोड़ी देर बाद वापस आकर सामने वाली बेंच पर बैठ गई.. सुमित से दर्द सहा नहीं जा रहा था.. रह रहकर थोड़ा बेचैन होने लगता सुमित.. वहाँ बैठे सभी लोगों की नज़रें सुमित को ताकने लगीं.. संध्या फिर उठी और गणेश के पास जाकर कहने लगी.. कुछ कीजिए.. उन्हें दर्द बर्दाश्त नहीं हो रहा है.. अगला हमें ही भेज दीजिए अन्दर.. गणेश संध्या के साथ सुमित के पास आया और कहने लगा.. अगर दर्द ज़्यादा है तो आप कमरे में जाकर लेट जाइए.. और उधर से सुमित का ज़वाब आया.. लेटने से दर्द कम होगा क्या..? दर्द तो दर्द है उसे क्या पता कि मैं बैठा हूँ या लेटा..? मैं यहीं ठीक हूँ.. कम से कम यहाँ देखने के लिये चेहरे तो हैं.. वरना अंदर तो पंखे के सिवा और कोई नहीं होगा.. सुमित की बातें सुनकर वहाँ बैठे सभी लोग मुस्कुराने लगे.. संध्या भी मुस्कुराई और बैठ गई.. तभी सुमित के बगल से आवाज़ आई.. क्या हुआ भाई आपके पैर में..? सुमित ने अपने बगल में देखा.. दो औरतें बुरक़ा पहने हुए बैठी थीं.. साथ मे दो बच्चे भी थे.. हाथ में एक रिपोर्ट थी.. देखने में दोनों स्वस्थ लग रहे थे.. सुमित के आने से पहले ही दोनों औरतें आपस में बैठे-बैठे बातें कर रहीं थीं.. सुमित ने ज़वाब दिया.. कुछ नहीं.. काफ़ी साल हो गये डॉक्टर से मिले.. सोचा मिल आते हैं.. तो ख़ाली हाथ क्यों आते.. तो अपना पैर लेते आये… दोनों के दोनों मुस्कुराईं और संध्या की तरफ़ देखकर बोलीं.. भाई बहुत मस्त हैं.. सच में कहीं मिलने ही तो नहीं आये.. अरे.. नहीं.. नहीं.. चौदह साल पहले इनके पाँव का ऑपरेशन हुआ था.. आज अचानक से काफ़ी ज़्यादा दर्द करने लगा.. सो मैं ले आई वरना ये तो आते भी नहीं.. दोनों की बातें सुनकर सुमित मुस्कुराने लगा..
थोड़ी ही देर बाद सुमित ने उनसे पूछा आप लोग क्यों आये यहाँ.. दूसरी वाली औरत ने ज़वाब दिया.. अरे.. हम इसकी सास की रिपोर्ट दिखाने आये हैं.. दो घण्टे हो गये पर नम्बर अभी तक नहीं आया.. सुमित ने पहली वाली से पूछा.. यह आपकी कौन लगती हैं.. उसने कहा मेरी सहेली है.. शबनम..! और मुस्कुराने लगी..
और आपका नाम..
उसने कहा.. रफ़ीज़ा..!
सुमित मुस्कुराया.. बेहद प्यारा नाम है आपका.. पहली बार सुना.. वैसे शबनम का मतलब तो पता है मुझे.. पर रफ़ीज़ा का नहीं.. क्या मतलब है आपके नाम का.. रफ़ीज़ा मुस्कुराई और बोली पता नहीं.. अब्बू ने रखा था.. सुमित ने तुरंत अपनी जेब से मोबाइल निकाला और गूगल पर ढूँढ़ने लगा.. पर वहाँ भी कुछ नहीं मिला.. देखिए गूगल भी नहीं बता पा रहा आपके नाम का मतलब.. और दोनों हँसने लगे.. संध्या भी सामने बैठे बैठे मुस्कुरा रही थी.. उसकी आँखें सुमित से कह रहीं थी कि क्या कर रहे हो.. कहीं भी शुरू हो जाते हो.. सुमित ने भी संध्या को इशारों में ही समझा दिया कि वह दो घण्टे चुपचाप तो नहीं बैठ सकता.. ये दोनों बच्चे बड़े प्यारे हैं.. दोनों आपके ही हैं.. तभी शबनम ने कहा.. नहीं.. नहीं.. ये दोनों तो मेरे हैं.. इसके तो बच्चे बड़े हैं.. कॉलेज जाते हैं.. पर बेचारी बहुत परेशान रहती है.. सुमित ने पूछा.. क्यों..? बच्चे ज़्यादा परेशान करते हैं क्या..? अरे.! नहीं भाई ये अपने शौहर से परेशान है.. शौहर से..! ऐसा क्या कर दिया आपके शौहर ने..
रफ़ीज़ा ने कहा.. शक करते हैं..
कई साल से दुबई में नौकरी कर रहे हैं.. साल में एक बार घर आते हैं.. पर हर रोज़ दिन में कम से कम दस फ़ोन तो आता ही है पर शायद ही इतने सालों में कभी ख़ैरियत पूछी हो.. सिर्फ़ सवाल ही होते हैं मेरे लिए.. कहाँ हो..? वहाँ क्यों हो..? कब से फ़ोन लगा रहा था तुम्हें.. किससे बात कर रही हो..? और भी ना जाने क्या..क्या..? बहुत ज़्यादा शक करते हैं मुझपर..और ये कहते कहते रफ़ीज़ा की आँखें नम हो गईं..
रफ़ीज़ा ने सुमित से सब कुछ ऐसे कह दिया जैसे बरसों से जानती हो उसको.. रफ़ीज़ा को देखते हुए सुमित को ऐसा लगा जैसे बहुत कुछ कहना चाहती हो उससे.. बड़े दिनों बाद रफ़ीज़ा भी कुछ अनजाना अपनापन महसूस कर रही थी.. कहना बहुत कुछ चाहती थी पर कहते कहते रुक गई.. उसकी आँखों में सच्चाई झलक रही थी.. पर वो अंदर ही अंदर ख़ुद को कोस रही थी.. मानो सुमित और संध्या की जगह वो ख़ुद को देखना चाहती हो.. सुमित ने रफ़ीज़ा से कहा.. एक काम कीजिए.. अगली बार जब आपके शौहर का फ़ोन आये तो उसके पूछने के पहले आप ही सवाल पूछ लीजिए.. अपने व्हाट्सएप्प पर अपनी ख़ूबसूरत सी डीपी लगाइए.. स्टेटस पर प्यार भरे शायरी रखिए.. करने दीजिए और शक.. देखना नौकरी छोड़कर वापस इंडिया आ जायेंगे.. रफ़ीज़ा मुस्कुराई.. और बोली.. या अल्लाह.. ये मुझसे ना हो पायेगा..
तो फिर दो रास्ते और हैं मेरे पास..
क्या..?
अगली बार जब आप ख़ुद को ज़्यादा परेशान पायें.. ख़ुद को कमरे में बंद कर लें.. और लाऊड म्युझिक में डांस करें.. देखना बहुत अच्छा लगेगा.. ना बाबा.. ये तो मुझसे नहीं हो सकता.. बच्चे क्या बोलेंगे.. अम्मी पागल हो गई है और मेरी सास तो मुझे जीने नहीं देगी..
तो फिर एक काम कीजिए.. किताबों से दोस्ती कर लीजिए.. जिसका साथ कोई नहीं देता.. उसका साथ किताबें देतीं हैं.. सुमित मुस्कुराया और रफ़ीज़ा भी.. तभी गणेश ने आवाज़ लगाई रफ़ीज़ा… अभी आपका नम्बर है आप अंदर जाइए…
मन के दर्द और शरीर के दर्द में बहुत फ़र्क़ होता है.. इतना फ़र्क़ कि कभी कोई शरीर समझ ही नहीं पाता मन को.. शायद समझना ही नहीं चाहता.. सभी तुलना करना चाहते हैं.. वो भी एक तरफ़ा.. सभी सुख से तुलना करते हैं पर दुःख से कोई नहीं करता.. दुःख.. सुख से तुलना करने पर ही आता है.. पर दुःख से तुलना करने पर अपना दुःख कम लगता है.. समाज में लोगों को कई दुःख हैं.. आप अपने दुःखों की तुलना उनके दुःखों से कर के देखिए.. देखना आपको अपना दुःख उनके दुःख से कम ही लगेगा..
सुमित को अपना दर्द मन ही मन भारी लग रहा था.. रफ़ीज़ा के दर्द ने सुमित के दर्द को हल्का कर दिया.. शायद ही सुमित रफ़ीज़ा को कभी भूल पाये..
रफ़ीज़ा रिपोर्ट दिखा कर बाहर आई.. और सुमित अंदर चला गया.. डॉक्टर ने सुमित को चेक किया.. दवाई दी.. एक्स रे निकालने को कहा.. और छ्ह महीने बाद वापस दिखाने को कहा.. सुमित डॉक्टर की केबिन से बाहर निकला.. रफ़ीज़ा बाहर ही खड़ी थी.. सिर्फ़ ये कहने के लिए..जा रही हूँ भाई.. पर आपको और आपकी बातों को हमेशा याद रखूँगी.. सुमित मुस्कुराया.. और बोला.. मैं भी याद रखूँगा तुम्हें… रफ़ीज़ा..!
© प्रशांत सिंह
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